मृदा अपरदन को मापने के लिये नई विधि:-
देहरादून अवस्थित ICAR- भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान के शोधकर्त्ताओं ने मृदा अपरदन और मृदा में कार्बन तत्त्व की कमी के मापन हेतु एक नई विधि का विकास किया है। इस विधि से प्राप्त परिणाम करंट साइंस (Current Science) नामक जर्नल में प्रकाशित किये गए हैं।
मृदा का निर्माण प्राकृतिक तत्त्वों द्वारा एक लंबी कालावधि में होता है। मृदा पेड़-पौधों, कीड़ों और सूक्ष्म जीवों को आधार प्रदान करती है।
सूक्ष्म जीवों की अपक्षयित वनस्पति पर क्रिया के माध्यम से कार्बन मृदा तक पहुँचता है और यह मृदा के भौतिक-रासायनिक गुणों को बदल कर इसकी उर्वरता को भी बढ़ाता है।
इस तरह से मृदा कार्बन अधिग्रहण (Carbon Sequestration) के द्वारा वातावरण में कार्बन के स्तर को विनियमित करने में भी सहायता करती है।
प्राकृतिक और मानवीय गतिविधियों के कारण मृदा अपरदन से खाद्य सुरक्षा पर संकट एवं जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याएँ गंभीर होती जा रही हैं।
इसलिये मृदा अपरदन और इसके कारण कार्बन क्षय की मॉनीटरिंग करना आवश्यक है।
क्या है नई विधि?
1 पहले के अध्ययनों से यह स्थापित किया गया था कि मृदा में कार्बन सांद्रता का सीज़ियम के समस्थानिक की सांद्रता के साथ सहसंबंध है।
2 इसका उपयोग वैज्ञानिकों ने पश्चिमोत्तर हिमालय में अवस्थित दून घाटी में मिट्टी के कटाव के विस्तार का अध्ययन करने हेतु किया था
3 दून घाटी को इसलिये चुना गया था क्योंकि यहाँ अपरदन से प्रभावित और अप्रभावित दोनों प्रकार की साइट्स एक-दूसरे से पर्याप्त दूरी पर मौजूद हैं।
4 भारतीय वैज्ञानिकों ने रेडियोएक्टिव सीज़ियम के स्तर के आकलन द्वारा मिट्टी में कटाव की दर और कार्बनिक सामग्री में कमी को मापने के लिये गामा स्पेक्ट्रोस्कोपी तकनीक (Gamma Spectroscopy Technique) का इस्तेमाल किया।
5 इस अध्ययन द्वारा 8 मेगा ग्राम प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष वाले कम अपरदित स्थानों से लेकर 31 मेगा ग्राम प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष वाले गंभीर रूप से अपरदित स्थानों की पहचान की गई।
नई विधि के लाभ:-
1 अत्यधिक गहन कृषि भूमि (Severely Intensive Croplands) में मृदा अपरदन के अध्ययन हेतु रेडियोएक्टिव सीज़ियम के स्तर को मापने के लिये यह एक तीव्र और कम खर्चीली विधि है।
2 यह ऐतिहासिक, तुलनात्मक और दीर्घकालिक मृदा अपरदन और मृदा में जैविक कार्बन क्षरण सहित सभी प्रकार के कटाव अध्ययनों के लिये अधिक सटीक परिणाम देती है।
3 मृदा अपरदन से मृदा के जैविक अंश में कमी आती है और अंततः इसकी उर्वरता में कमी हो जाती है। यह विधि मृदा अपरदन के प्रभावों और मृदा संरक्षण रणनीतियों की प्रभावशीलता की मॉनीटरिंग में सहायक हो सकती है।
4 हालाँकि सीज़ियम के प्रयोग के प्रमाणीकरण के लिये विभिन्न भू-परिदृश्यों और भूमि उपयोग संबंधी बड़े डेटाबेस की आवश्यकता है, ताकि विभिन्न प्रकार की भूमियों की कार्बन अधिग्रहण क्षमता का मापन किया जा सके।
क्या है मृदा अपरदन?
बहते हुए जल या वायु के प्रवाह द्वारा मृदा के विघटन तथा एक स्थान से दूसरे स्थान तक स्थानातंरण को मृदा अपरदन कहा जाता है।
देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 57% भाग मृदा ह्रास के विभिन्न प्रकारों से प्रभावित है। जिसका 45% जल अपरदन से तथा शेष 12% भाग वायु अपरदन से प्रभावित है।
भारत में मृदा अपरदन के मुख्य कारण:-
1 पेड़की अविवेकपूर्ण कटाई।
2 वानस्पतिक आवरण में कमी।
3 वनों में आग लगना।
4 भूमि को बंजर/खाली छोड़कर जल व वायु अपरदन के लिये प्रेरित करना।
5 मृदा अपरदन को तेज़ करने वाली फसलों को उगाना।
6 त्रुटिपूर्ण फसल चक्र अपनाना।
7 ढलान की दिशा में कृषि कार्य करना।
8 सिंचाई की त्रुटिपूर्ण विधियाँ अपनाना।
मृदा संरक्षण के उपाय:-
1 समोच्च जुताई
2 पट्टीदार खेती
3 भू-परिष्करण प्रक्रियाएँ (टिलेज प्रैक्टिसेज़)
4 वायु अवरोधक व आश्रय आवरण
5 समोच्च बांध
6 श्रेणीबद्ध बांध
7 वृहत् आधार वाली वेदिकाएँ
8 सीढ़ीनुमा वेदिकाएँ
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